हिमाचल सरकार का नया शुल्क निर्णय गरीबों पर बोझ, स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन

हिमाचल सरकार का नया शुल्क निर्णय गरीबों पर बोझ, स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन

चम्बा 04 जून मुकेश कुमार (गोल्डी)

हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा कल 5 जून से सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में ओपीडी पर्ची पर 10 रूपए का शुल्क और 133 जांचों पर शुल्क लागू करने का निर्णय जनआक्रोश का कारण बन गया है। मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू की अगुवाई वाली सरकार इस कदम को स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर बनाने की दिशा में एक सुधार मान रही है, लेकिन जनमानस इसे गरीबों के खिलाफ एक अन्यायपूर्ण कदम और संवैधानिक स्वास्थ्य अधिकारों का उल्लंघन मान रहा है।प्रदेश की बड़ी आबादी विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाली जनता दिहाड़ी मजदूरी पर निर्भर है। ऐसे में 10 रूपए की ओपीडी पर्ची और जांचों के लिए अतिरिक्त शुल्क गरीब परिवारों के लिए एक अतिरिक्त आर्थिक बोझ है।

विधानसभा क्षेत्र भरमौर के विधाय डाक्टर जनक राज ने सरकार के इस फैसले को दुर्भाग्यपूर्ण करार देते हुए कहा कि बार-बार इलाज के लिए आने वाले मरीज, विशेषकर बुजुर्ग, बीमार और दिव्यांग, इस फैसले से सबसे ज्यादा प्रभावित होंगे। यह निर्णय उन्हें या तो इलाज से वंचित कर देगा या फिर महंगे निजी अस्पतालों की ओर धकेल देगा।यह फैसला भारत के संविधान के अनुच्छेद 21, जो जीवन और स्वास्थ्य का अधिकार सुनिश्चित करता है, का सीधा उल्लंघन है। सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले जैसे परमानंद कटारा बनाम भारत संघ और पश्चिम बंगाल खेत मजदूर समिति मामले इस अधिकार की पुष्टि कर चुके हैं। इसके बावजूद सरकार गरीबों पर शुल्क थोप रही है, जो स्वास्थ्य सेवाओं को आम जनता से दूर ले जाएगा।सरकार ने शुल्क से मिलने वाले राजस्व को स्वास्थ्य ढांचे को मजबूत करने का जरिया बताया है, लेकिन पारदर्शिता को लेकर संदेह बना हुआ है।

तो वहीं विधानसभा क्षेत्र डलहौजी के विधायक डीएस ठाकुर में इस शुल्क को गरीब विरोधी करार दिया है उन्होंने कहा है सरकार पहले से ही गरीबों की मददगार हिमकेयर योजना में पहले से ही बकाया भुगतान की समस्याएं हैं। ऐसे में यह निर्णय निजी अस्पतालों को बढ़ावा देने का प्रयास माना जा रहा है।जनता, विपक्षी दल और सामाजिक कार्यकर्ता इस निर्णय की आलोचना कर रहे हैं।

सोशल मीडिया पर विरोध के स्वर तेज हो चुके हैं और सड़कों पर विरोध प्रदर्शन की संभावना भी बढ़ गई है। सरकार को चाहिए कि वह इस निर्णय पर पुनर्विचार करे और आय आधारित छूट या मुफ्त सेवाएं सुनिश्चित करे, ताकि स्वास्थ्य सेवाएं सभी के लिए सुलभ बनी रहें।

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