ग्राम पंचायत मैहला के गांव चुराड़ी में बना “घराट” प्राचीन तकनीक और जलशक्ति का अनूठा उदाहरण

चंबा 22 मार्च मुकेश कुमार (गोल्डी)
हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में स्थित ग्राम पंचायत मैहला के गांव चुराड़ी में एक 65 वर्षीय घराट आज भी जलशक्ति आधारित प्राचीन तकनीक का जीवंत उदाहरण बना हुआ है। यह घराट बिना बिजली के केवल नदी-नालों की जलधारा की शक्ति से संचालित होता है और इसके जरिए विभिन्न अनाजों की पिसाई की जाती है। इस पारंपरिक पद्धति में तापमान कम रहता है, जिससे आटे की पौष्टिकता बरकरार रहती है।
जलशक्ति आधारित तकनीक का महत्व
घराट एक पारंपरिक पद्धति है, जिसमें जलधारा से घूमने वाले पाटों के माध्यम से अनाज पीसा जाता है। यह प्रक्रिया पूरी तरह पर्यावरण-अनुकूल होती है क्योंकि इसमें किसी बाहरी ऊर्जा स्रोत की आवश्यकता नहीं होती। कम तापमान में पिसाई होने से आटे में मौजूद रेशा, विटामिन और अन्य पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं, जिससे यह आटा मिलों में पिसे आटे की तुलना में अधिक पौष्टिक होता है।

बदलते दौर में घराटों की स्थिति
कभी जिला चंबा में घराटों का व्यापक उपयोग होता था, लेकिन आधुनिक विद्युत चालित आटा चक्कियों के आगमन से इनकी संख्या में भारी गिरावट आई है। फिर भी कुछ ग्रामीण क्षेत्रों में यह तकनीक अब भी जीवित है, और कई लोग घराट के आटे को स्वास्थ्य के लिए लाभदायक मानते हैं।
65 वर्षों से संचालित ऐतिहासिक घराट
विकास खंड मैहला के गांव चुराड़ी निवासी बृजलाल अपने पिता स्वर्गीय मट्टू राम द्वारा वर्ष 1960 में स्थापित घराट को आज भी चला रहे हैं। यह घराट न केवल उनके परिवार के लिए आजीविका का स्रोत है, बल्कि आस-पास की ग्राम पंचायतों की करीब 10 हजार की आबादी के लिए अनाज पिसाई का एक महत्वपूर्ण साधन भी है।बृजलाल ने बताया कि उनके घराट में प्रतिदिन लगभग तीन किवंटल गेहूं और दो किवंटल मक्की की पिसाई की जाती है। यहां ग्राम पंचायत बंदला, बागड़ी, बांग्ला और मैहला के लोग गेहूं, मक्की, चावल, चना, दाल और हल्दी की पिसाई करवाते हैं।

स्थानीय निवासियों की पहली पसंद ,घराट का आटा
क्षेत्र में विद्युत चालित आटा चक्कियां होने के बावजूद, कई ग्रामीण अब भी घराट के आटे को प्राथमिकता देते हैं। स्थानीय निवासी दीक्षा ठाकुर, संदीप कुमार, संत राम, सुभाष कुमार, बूटा राम, राजेंद्र कुमार और अन्य लोगों का कहना है कि घराट से पिसा आटा अधिक स्वास्थ्यवर्धक होता है क्योंकि इसमें सभी पोषक तत्व सुरक्षित रहते हैं।

मौजूदा समय में संरक्षण की जरूरत
आज पारंपरिक तकनीकों का लुप्त होना एक चिंता का विषय है, ऐसे में सरकार और स्थानीय प्रशासन को इन घराटों के संरक्षण के लिए आवश्यक कदम उठाने चाहिए। यदि इन्हें आधुनिक तकनीक से जोड़ा जाए और वित्तीय सहायता प्रदान की जाए, तो यह न केवल हमारी सांस्कृतिक धरोहर को बचाने में मदद करेगा, बल्कि पर्यावरण संरक्षण और स्वास्थ्य के लिए भी लाभदायक सिद्ध होगा।