मनरेगा की अधिकार आधारित संरचना से छेड़छाड़ चिंताजनक :- मनीष सरीन

मनरेगा की अधिकार आधारित संरचना से छेड़छाड़ चिंताजनक :- मनीष सरीन

डलहौजी/ चम्बा 13 जनवरी मुकेश कुमार (गोल्डी)

डलहौज़ी विधानसभा क्षेत्र से भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कार्यकर्ता मनीष सरीन ने केंद्र सरकार द्वारा मनरेगा के स्थान पर प्रस्तावित Viksit Bharat – Guarantee for Rozgar and Ajeevika Mission (Gramin) – VB-GRAM-G को लेकर कड़ी आपत्ति जताई है। उन्होंने कहा कि महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोज़गार गारंटी अधिनियम (मनरेगा) ग्रामीण भारत के लिए एक स्थायी और कानूनी अधिकार रहा है, जबकि VB-GRAM-G को एक नई योजना/विधेयक के रूप में लाकर उसकी मूल पहचान और अधिकार आधारित संरचना को कमजोर किया जा रहा है।मनीष सरीन ने कहा कि मनरेगा संसद द्वारा पारित कानून है, जिसके तहत ग्रामीण परिवारों को प्रति वर्ष 100 दिनों के मज़दूरी आधारित रोज़गार की कानूनी गारंटी दी गई थी। साथ ही यदि 15 दिनों के भीतर काम उपलब्ध नहीं कराया जाता था, तो बेरोज़गारी भत्ता देने का स्पष्ट प्रावधान भी था। इसके विपरीत VB-GRAM-G में रोज़गार अवधि को 125 दिन तक बढ़ाने की बात तो की गई है, लेकिन इसे “normative funding” और सीमित बजटीय आवंटन से जोड़ा गया है।उन्होंने बताया कि नई योजना में केंद्र और राज्य सरकार की हिस्सेदारी को 60:40 कर दिया गया है, जिससे राज्यों पर अतिरिक्त वित्तीय दबाव पड़ेगा। सरीन के अनुसार, मनरेगा की सबसे बड़ी ताकत उसकी मांग-आधारित प्रकृति थी, जिसमें ग्रामीण परिवार आवश्यकता के अनुसार काम की मांग कर सकते थे। जबकि VB-GRAM-G में केंद्र द्वारा तय बजट के आधार पर राज्यवार आवंटन होगा, जिससे वास्तविक ग्रामीण मांग की अनदेखी होने की आशंका है।सरीन ने यह भी कहा कि योजना के नाम से “महात्मा गांधी” को हटाना सरकार की प्राथमिकताओं में बदलाव को दर्शाता है। उन्होंने याद दिलाया कि मनरेगा का ढांचा ग्राम सभा, पंचायत स्तर, पारदर्शिता और सामाजिक ऑडिट पर आधारित रहा है, जिससे विशेषकर महिलाओं को बड़ा लाभ मिला है, जिनकी भागीदारी 50 प्रतिशत से अधिक रही है।अंत में उन्होंने कहा कि कांग्रेस पार्टी का स्पष्ट मत है कि मनरेगा को कमजोर नहीं बल्कि और सशक्त किया जाना चाहिए, ताकि ग्रामीण परिवारों को समय पर रोज़गार, उचित मज़दूरी और सामाजिक सुरक्षा का अधिकार मिलता रहे।

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