डलहौजी वन मंडल का अभिनव प्रयास: जनसहयोग और जैव विविधता के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण की दिशा में मजबूत कदम

चंबा, 7 जून मुकेश कुमार (गोल्डी)
पर्यावरण संरक्षण की दिशा में डलहौजी वन मंडल द्वारा एक उल्लेखनीय पहल की गई है, जिसमें जनसहयोग और जैव विविधता को आधार बनाकर वनों को आग से बचाने और आजीविका के नए साधन विकसित करने की दिशा में कार्य किया गया है। डलहौजी के डीएफओ रजनीश महाजन ने जानकारी दी कि कोई भी योजना जन सहभागिता के बिना सफल नहीं हो सकती, इसी सोच के तहत ग्रामीण वन प्रबंधन समितियों के सहयोग से वनों में आग की घटनाओं को कम करने के लिए विशेष अभियान चलाया गया है।

महाजन ने बताया कि वनों में बार-बार लगने वाली आग जैव विविधता को नष्ट करती है और परावर्तित अनुक्रमण (रेट्रोग्रेसिव सक्सेशन) की प्रक्रिया को बढ़ावा देती है, जिससे वन विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसे रोकने के लिए वन विभाग ने चीड़ की सूखी पत्तियों को हटाकर नालों पर 171 चेक डैम बनाए हैं, जिससे न केवल आग की संभावना घटी है, बल्कि मिट्टी का कटाव भी रुका है। इसके अलावा, आग से प्रभावित क्षेत्रों में देसी प्रजातियों के बीज बोए गए हैं और आर्द्र क्षेत्रों में सैलिक्स के पोल लगाए गए हैं।वन सुरक्षा के साथ-साथ स्थानीय आजीविका सशक्त करने हेतु फलदार और औषधीय पौधों जैसे लसूड़ा, अखरोट, आंवला, हरड़, बेहड़ा और रीठा की नर्सरी तैयार की गई है।।

लसूड़ा की नर्सरी विशेष प्रशिक्षण के बाद तैयार की गई है, क्योंकि इसके बीज कीटों से प्रभावित होते हैं। लसूड़ा का बाजार मूल्य 70-80 रुपये प्रति किलोग्राम है और एक वयस्क पेड़ से 50 किलोग्राम तक उत्पादन हो सकता है।अग्निरोधी प्रजातियों जैसे कैंथ, खजूर, अमलताश, दाडू, त्रैम्बल और फगुड़ा को भी नर्सरी में उगाया गया है, जो चीड़ के जंगलों में भी जीवित रह सकती हैं। जैव विविधता को बढ़ावा देने हेतु “जैवविविध नर्सरी” की अवधारणा अपनाई गई है, जहां रूट ट्रेनर में कोकोपीट और वर्मीकम्पोस्ट का उपयोग कर पौधों को तैयार किया गया है।

अब तक 30,000 से अधिक पौधे जैसे पीपल, बरगद, रूम्बल, त्रैम्बल और पलाख तैयार किए गए हैं, जिन्हें “फाइकस वन” के रूप में राजमार्गों के किनारे रोपित किया जाएगा। ये न केवल पर्यावरण संतुलन बनाएंगे, बल्कि पक्षियों के लिए भी आदर्श आवास बनेंगे।