पांगी घाटी में सिहाल–जुकारू पर्व की धूम, परंपरा और आस्था का अनूठा संगम

पांगी घाटी में सिहाल–जुकारू पर्व की धूम, परंपरा और आस्था का अनूठा संगम

पांगी/चम्बा 17 फरवरी मुकेश कुमार (गोल्डी)

पांगी/चम्बा 17 फरवरी मुकेश कुमार (गोल्डी)

चंबा जिला की जनजातीय पांगी घाटी में फाल्गुन मास की अमावस्या को मनाया जाने वाला पारंपरिक पर्व सिहाल–जुकारू पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। यह पर्व केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि पांगी घाटी की सांस्कृतिक पहचान, आस्था, भाईचारे और सामूहिक एकता का प्रतीक है। पर्व के अवसर पर घाटी के लोगों ने एक-दूसरे को शुभकामनाएं दीं और पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ खुशियां साझा कीं।

जब पूरी घाटी बर्फ की सफेद चादर में लिपटी होती है और पंगवाल समुदाय के पारंपरिक श्वेत परिधान से साम्य दर्शाती है, तब लोग अपनी सदियों पुरानी परंपराओं का पूरी श्रद्धा के साथ निर्वहन करते हैं। जुकारू पर्व का मुख्य उद्देश्य इस समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को संरक्षित रखना और आने वाली पीढ़ियों तक पहुंचाना है।यह पर्व तीन चरणों—सिहाल, पदिद और मंगल—में मनाया जाता है। इसकी तैयारियां कई दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। सिहाल के दिन घरों की साफ-सफाई की जाती है और उन्हें सजाया जाता है।

घरों की दीवारों पर पारंपरिक लोक चित्रांकन और प्रतीकात्मक लेखन किया जाता है। इस दौरान राजा बलि के विशेष चित्र बनाए जाते हैं, जिन्हें पर्व का केंद्रीय आराध्य माना जाता है।पर्व के दौरान पारंपरिक व्यंजन मंडे विशेष रूप से तैयार किए जाते हैं। रात्रि के समय राजा बलि के चित्र के समक्ष दीप प्रज्वलित कर भोजन और प्रकाश अर्पित किया जाता है। परंपरा के अनुसार इस रात चरखे पर सूत कातना वर्जित माना जाता है और सभी लोग शीघ्र विश्राम करते हैं।पौराणिक मान्यता के अनुसार, यह पर्व राजा बलि से जुड़ा है, जो भगवान विष्णु के परम भक्त थे।

विष्णु ने वामन अवतार में उनसे तीन पग भूमि मांगी, जिसे बलि ने अपना सर्वत्र अर्पित कर दिया। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान विष्णु ने उन्हें वर्ष में एक बार पृथ्वी पर पूजित होने का वरदान दिया। पांगी घाटी में मनाया जाने वाला जुकारू पर्व आज भी उसी आस्था और विश्वास का जीवंत प्रतीक है । इस आयोजन को लेकर विधान सभा भरमौर के विधायक डॉक्टर जनक राज ने भी समस्त पांगीवासियों को इस उत्सव को लेकर अपने सोशल मीडिया हैंडल पर ढेर सारी शुभकामनाएं दी हैं ।

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