आज भारत बना है वैश्विक गाँव का मेहनती परिवार डॉ. जनक राज, विधायक विधानसभा क्षेत्र भरमौर

भरमौर/ चम्बा 15 मई मुकेश कुमार (गोल्डी)
हर साल 15 मई को अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस मनाया जाता है, जो परिवारों की सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक भूमिका को रेखांकित करता है। यह दिन हमें सोचने पर मजबूर करता है कि अगर पूरी दुनिया एक गाँव होती, तो उसमें भारत की भूमिका क्या होती?
कल्पना कीजिए कि विश्व एक बड़ा गाँव है और हर देश उसमें एक परिवार के रूप में बसा है। भारत इस गाँव का एक ऐसा परिवार है, जिसने संघर्ष, कठिनाइयों और सीमित संसाधनों के बावजूद अपने श्रम, समर्पण और आत्मबल के दम पर आश्चर्यजनक तरक्की की है। तकनीक, विज्ञान, अंतरिक्ष, चिकित्सा और आर्थिक क्षेत्र में भारत की उपलब्धियाँ अब दुनिया भर में चर्चा का विषय बन चुकी हैं। पारंपरिक रूप से विकसित माने जाने वाले देश — जैसे अमेरिका, फ्रांस और जर्मनी — अब भारत की प्रगति को गंभीरता से लेने लगे हैं।
इस गाँव में भारत के कई पड़ोसी परिवार भी हैं — चीन, नेपाल, बांग्लादेश और श्रीलंका। भारत की तेज़ गति से होती प्रगति को देखकर उनमें कहीं प्रतिस्पर्धा, कहीं ईर्ष्या और कहीं संदेह का भाव उभरता है। कुछ पुराने मित्र देश, जो पहले सहयोग करते थे, अब सोचते हैं कि भारत को शायद उनकी आवश्यकता नहीं रही। यह बदलता हुआ दृष्टिकोण स्वाभाविक है, क्योंकि देश भी इंसानों की तरह सोचते और महसूस करते हैं।
ऐसे समय में भारत को एक संगठित, समावेशी और आत्मनिर्भर परिवार के रूप में आगे बढ़ने की ज़रूरत है। आंतरिक मतभेदों को भुलाकर, शिक्षा, विज्ञान, तकनीकी नवाचार और सामाजिक एकता को प्राथमिकता देकर भारत एक ऐसा उदाहरण बन सकता है जो पूरे वैश्विक गाँव के लिए प्रेरणास्रोत हो।इस अंतर्राष्ट्रीय परिवार दिवस पर भारत को यह संकल्प लेना चाहिए कि वह बिना रुके, बिना झुके, अपने सपनों की ओर निरंतर अग्रसर रहेगा — एक ऐसे आदर्श परिवार की तरह, जो न केवल खुद आगे बढ़ता है, बल्कि पूरे गाँव को साथ लेकर चलता है।