मैदानों में गर्मी बढ़ने के साथ ही घुमंतू बकरवालों ने अपनी भेड़ बकरियों सहित पहाड़ों का किया रुख

मैदानों में गर्मी बढ़ने के साथ ही घुमंतू बकरवालों ने अपनी भेड़ बकरियों सहित पहाड़ों का किया रुख

चंबा/ डलहौजी 23 अप्रैल मुकेश कुमार (गोल्डी)

मैदानों में गर्मी बढ़ने के साथ ही घुमंतू बकरवालों (पोहाल) ने अपनी भेड़ बकरियां सहित इन दोनों पहाड़ों का रुख कर लिया है । बता दे की पहाड़ों पर सर्दियां शुरू होते ही यह नीचे मैदानों में उतर जाते हैं और मैदानों में गर्मी बढ़ने के साथ ही पहाड़ों की और रुख कर लेते हैं। जिला चंबा का यह समृद्ध बकरवाल समुदाय किसी पहचान का मोहताज नहीं है अपने आराध्य शिव को समर्पित अपने जीवन का ज्यादातर समय पहाड़ों पर ही गुजारते हैं। समुदाय का मुख्य व्यवसाय भेड़पालन है।

इन लोगों का जीवन बेहद संघर्षपूर्ण होता है. गर्मियों में ये लोग पहाड़ों की ओर निकल जाते हैं, बरसात के मौसम में भी ये भेड़पालक पहाड़ों पर ही रहते हैं। सर्दियों के आते ही ये लोग अपने पशुओं के साथ मैदानी इलाकों की ओर रुख कर लेते हैं। समुदाय में होने वाले विवाह, जातर-मेलों व अन्य समारोह के दौरान ये नृत्य किया जाता है,जिसमें पुरूष चोलू-डोरा व महिलाएं लुआंचडी-डोरा के साथ आभूषण पहनकर एक घेरे में नाचते हैं। पुरुष और महिलाएं दोनों कान में बालियां और भेड़ की ऊन और बकरी के बाल से बने कपड़े पहनते हैं।

पुरुष अपने सिर पर पगड़ी पहनते हैं, जिसे वे साफा कहते हैं और डोरा के साथ एक प्रकार का चोला पहनते हैं. तो वहीं स्त्रियां लुआंचड़ी पहनती हैं और नाक में नथ, माथे पर टीका और सिर पर दुपट्टा ओढ़ती हैं। ये समुदाय अपनी पुरानी संस्कृति और विरासत को आज भी संजो कर रखा है. समुदाय की सबसे बड़ी रोचक बात ये है कि इससे जुड़े लोग देश-विदेश में कहीं भी रह रहे हो, लेकिन वे अपनी कला और संस्कृति को नहीं भूले हैं।

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