बकलोह, ककीरा में गोरखा समुदाय द्वारा पांच दिवसीय होली उत्सव का विशेष महत्व

भटियात/ चम्बा 04 मार्च मुकेश कुमार (गोल्डी)
हिंदू धर्म में आस्था रखने वाले गोरखा समुदाय के बीच होली का पर्व अपनी विशिष्ट परंपराओं और रीति-रिवाजों के कारण विशेष महत्व रखता है। अन्य स्थानों पर जहां होली मुख्य रूप से एक-दो दिन मनाई जाती है, वहीं गोरखा समुदाय इस उत्सव की शुरुआत होली से पांच दिन पूर्व ही कर देता है। इस वर्ष समुदाय ने 27 फरवरी, शुक्रवार से होली उत्सव का शुभारंभ किया, जो होलिका दहन की रात्रि के साथ संपन्न हुआ।गोरखा परंपरा के अनुसार, उत्सव की शुरुआत घर की महिलाएं करती हैं। वे प्रातःकाल आंवला के पेड़ के नीचे भगवान विष्णु, माता लक्ष्मी और माता सरस्वती की विधिवत पूजा-अर्चना कर त्योहार का श्रीगणेश करती हैं।

इसके उपरांत परिवार के बुजुर्ग घर की कुलदेवी और स्थापित देवी-देवताओं की पूजा कर उन्हें लाल गुलाल अर्पित करते हैं। फिर घर का मुखिया सभी सदस्यों को एक साथ बैठाकर उनके माथे पर लाल, हरे और पीले अबीर का टीका लगाता है और आशीर्वाद प्रदान करता है। यह ‘होली टीका’ की परंपरा पूरे पांच दिनों तक चलती है।इन दिनों में गोरखा समुदाय के लोग अपने सगे-संबंधियों के घर जाकर बुजुर्गों से टीका लगवाकर आशीर्वाद लेते हैं। घरों में पारंपरिक व्यंजन जैसे गुजिया, मट्ठी, रसगुल्ला, सेल रोटी, रसभरी और खजूर की मिठाइयां सहित विभिन्न पकवान बनाए जाते हैं, जिनसे अतिथियों का सत्कार किया जाता है।

पांचवें दिन होलिका दहन के बाद अगले दिन सभी लोग एक-दूसरे के घर जाकर नृत्य, गीत और रंगों के साथ होली मनाते हैं। बच्चे, महिलाएं और बुजुर्ग पूरे उत्साह के साथ इस पर्व का आनंद लेते हैं। गोरखा समुदाय की यह परंपरा आपसी प्रेम, सम्मान और सांस्कृतिक एकता का सुंदर प्रतीक है।