सन्त निरंकारी मिशन के तहत बनीखेत सत्संग भवन में मानवता और प्रेम-भक्ति का दिया गया संदेश

सन्त निरंकारी मिशन के तहत बनीखेत सत्संग भवन में मानवता और प्रेम-भक्ति का दिया गया संदेश

डलहौजी/ चम्बा 22 फरवरी मुकेश कुमार (गोल्डी)

सन्त निरंकारी सत्संग भवन बनीखेत में आयोजित आध्यात्मिक सत्संग के दौरान महात्मा ललित अबरोल जी ने साध संगत को मानवता, प्रेम और परमात्मा की अनुभूति का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि परमात्मा को जानने के बाद ही मनुष्य अपने वास्तविक स्वरूप को पहचान पाता है और समझता है कि वह आत्मिक रूप से उसी परमात्मा का अंश है। जब एक परमात्मा का एहसास हृदय में जागृत होता है, तब एकत्व का भाव स्वतः साकार हो जाता है।अबरोल जी ने कहा कि परमात्मा के साकार स्वरूप को जानकर प्रेम भावना से की गई भक्ति ही सच्ची प्रेमा-भक्ति है। यदि हम हर व्यक्ति में परमात्मा का वास मानकर चलें और सभी को श्रेष्ठ समझें, तो समाज से भेदभाव स्वतः समाप्त हो सकता है। उन्होंने निःस्वार्थ सेवा, आपसी सहयोग और ‘सरबत के भले’ की भावना को मानव जीवन का आधार बताया।अपने संबोधन में उन्होंने कहा कि संत का हृदय सभी के लिए समान रूप से पिघलता है और उसमें अपने-पराए का कोई भेद नहीं रहता। केवल शारीरिक रूप से इंसान होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मानव मात्र के प्रति व्यवहार में मानवता झलकनी चाहिए।

उन्होंने प्रेरित करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को कीचड़ में कमल की तरह खिलना चाहिए—अर्थात विपरीत परिस्थितियों में भी अपने जीवन को श्रेष्ठ और सकारात्मक बनाए रखना चाहिए।अबरोल जी ने आगे कहा कि प्रभु-परमात्मा का सहारा लेकर हमें अपने भीतर मानवीय गुणों का विस्तार करना चाहिए तथा ब्रह्मज्ञान प्राप्त कर भक्ति का आनंद लेना चाहिए। संत-महात्माओं की शिक्षा रही है कि भौतिक उपलब्धियां महत्वपूर्ण हैं, परंतु जीवन में प्राथमिकता प्रभु की अनुभूति को ही दी जानी चाहिए। उन्होंने मानवता की सेवा को सच्ची भक्ति का मार्ग बताते हुए सभी को सेवा और समर्पण की भावना अपनाने का आह्वान किया।

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