डलहौज़ी नगर परिषद चुनाव, सियासी समीकरण बदले, चुनावी मुकाबला 2027 की जंग का ट्रेलर हुआ साबित

डलहौज़ी नगर परिषद चुनाव, सियासी समीकरण बदले, चुनावी मुकाबला 2027 की जंग का ट्रेलर हुआ साबित

डलहौजी/ चम्बा 20 मई मुकेश कुमार (गोल्डी)

डलहौज़ी नगर परिषद चुनाव एक बार फिर प्रदेश की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। 9 सीटों वाली इस परिषद में हुए हालिया चुनावों ने न केवल स्थानीय स्तर पर सत्ता परिवर्तन का संकेत दिया है, बल्कि जिला चंबा की राजनीति में भी बड़ा हलचल पैदा कर दिया है। पूर्व नगर परिषद अध्यक्ष मनोज चड्ढा और छह बार की विधायक व पूर्व शिक्षा मंत्री आशा कुमारी के अनौपचारिक गठबंधन ने भाजपा विधायक डीएस ठाकुर समर्थित उम्मीदवारों को 5-4 से हराकर राजनीतिक समीकरण पूरी तरह बदल दिए हैं।यह चुनाव सामान्य स्थानीय निकाय चुनाव से कहीं अधिक “शक्ति प्रदर्शन” के रूप में देखा जा रहा है। विधायक डीएस ठाकुर ने अपने समर्थित उम्मीदवारों को खुलकर भाजपा का आधिकारिक समर्थन बताया, वहीं मनोज चड्ढा ने कांग्रेस की वरिष्ठ नेता आशा कुमारी के साथ मिलकर मोर्चा खोल दिया। परिणामस्वरूप भाजपा खेमे को झटका लगा और कांग्रेस समर्थित गठजोड़ को बढ़त मिली।मनोज चड्ढा की राजनीतिक भूमिका इस चुनाव के बाद चर्चा का प्रमुख विषय बन गई है। पिछले दो दशकों में भाजपा और कांग्रेस के बीच उनका आना-जाना रहा है। 2017 में उन्होंने कांग्रेस छोड़ भाजपा जॉइन की थी और टिकट के दावेदार भी रहे थे। हालांकि पार्टी ने उस समय डीएस ठाकुर पर भरोसा जताया। 2022 में ठाकुर की बड़ी जीत ने उन्हें क्षेत्र में मजबूत नेता के रूप में स्थापित किया, लेकिन नगर परिषद चुनाव के नतीजों ने उनकी पकड़ को चुनौती दी है।चुनाव परिणामों के बाद भाजपा संगठन की मुश्किलें बढ़ती नजर आ रही हैं।

पार्टी ने पहले ही मनोज चड्ढा समेत कई नेताओं के खिलाफ अनुशासनहीनता की शिकायत दर्ज की है। अब देखना होगा कि पार्टी नेतृत्व उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करता है या चुनावी जीत को देखते हुए नरमी बरतता है।राजनीतिक गलियारों में यह अटकलें भी तेज हैं कि यदि भाजपा कड़ा रुख अपनाती है, तो मनोज चड्ढा की कांग्रेस में वापसी हो सकती है। दिलचस्प यह भी है कि जो आशा कुमारी और चड्ढा कभी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी माने जाते थे, वे अब एक मंच पर दिखाई दिए हैं।विश्लेषकों का मानना है कि इस चुनाव ने आशा कुमारी के प्रभाव को एक बार फिर साबित किया है। 2022 की हार के बाद उनके कमजोर होने की चर्चाओं को इस जीत ने खारिज कर दिया है। वहीं भाजपा का दावा है कि नगर परिषद चुनाव टॉस के माध्यम से बाय लक कांग्रेस के पाले में गया किंतु हर जगह भाग्य साथ नहीं देता, विधानसभा चुनावों का समीकरण अलग होता है और ग्रामीण क्षेत्रों में उनकी पकड़ आज भी मजबूत बनी हुई है। बावजूद इसके यह चुनाव भाजपा के भीतर आपसी गुटबाजी को भी उजागर करता है। यदि यह अंदरूनी संघर्ष जारी रहा, तो 2027 विधानसभा चुनाव में कांग्रेस को इसका सीधा लाभ मिल सकता है। अब पूरे प्रदेश की नजर इस बात पर टिकी है कि भाजपा अपने छः बागीयों क्या कदम उठाती है और डलहौज़ी की राजनीति किस दिशा में आगे बढ़ती है।

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