प्रकृति के प्रकोप से खंडित हुई मणिमहेश यात्रा की सदियों पुरानी परंपरा

चंबा/भरमौर, 30 अगस्त मुकेश कुमार (गोल्डी)
हिमाचल प्रदेश के चंबा जिले में प्राकृतिक आपदा ने न केवल जनजीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया है, बल्कि आस्था और परंपरा पर भी गहरा असर डाला है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण इस बार की मणिमहेश यात्रा में देखने को मिला, जब इतिहास में पहली बार ‘डल तोड़ने’ की पवित्र रस्म पूरी नहीं हो सकी।हर वर्ष राधा अष्टमी पर संचुई गांव के शिव चेले परंपरा के अनुसार पवित्र मणिमहेश डल झील को तोड़ने की रस्म निभाते हैं।

इस बार भी आज सुबह वे आस्था से ओतप्रोत होकर यात्रा पर निकले। किंतु जब जत्था हड़सर पहुंचा तो आगे जाने वाला मार्ग पूरी तरह से भूस्खलन और बाढ़ के कारण तबाह पाया गया। जगह-जगह भारी पत्थर, मलबा और लगातार हो रही बारिश ने यात्रा को असंभव बना दिया। हालात को देखते हुए शिव चेलों ने जोखिम न उठाते हुए वहीं से लौटने का निर्णय लिया।स्थानीय निवासियों का कहना है कि मणिमहेश यात्रा के सैकड़ों वर्षों के इतिहास में यह पहली बार हुआ है कि ‘डल तोड़ने’ की परंपरा अधूरी रह गई। यह रस्म यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र हिस्सा मानी जाती है, जिसे संचुई गांव के शिव चेलों और कुगती स्थित कार्तिक स्वामी मंदिर के ‘गूर’ द्वारा निभाया जाता था।

इस परंपरा का खंडित होना न केवल आपदा की भयावहता को दर्शाता है, बल्कि क्षेत्र के लोगों के लिए भावनात्मक आघात भी है। श्रद्धालु इसे एक अशुभ संकेत मान रहे हैं। वहीं प्रशासन राहत और बचाव कार्यों में जुटा हुआ है, क्योंकि जिले की कई सड़कें बंद हैं और मणिमहेश सहित विभिन्न स्थलों पर तीर्थयात्री फंसे हुए हैं।मणिमहेश यात्रा से जुड़ी इस अनहोनी ने स्पष्ट कर दिया है कि प्राकृतिक आपदा ने चंबा जिले को गहरे संकट में डाल दिया है।